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21 July, 2015, 07:35 AM
वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠकी बीमारियाठऔर उनसे बचाव
हैजा à¤à¤• संकà¥à¤°à¤¾à¤®à¤• रोग है, जो विविरियो कोलà¥à¤°à¥€ नामक जीवाणॠदà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होता है। ये जीवाणॠसाधारण दूषित जल के माधà¥à¤¯à¤® से रोगी से सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ मनà¥à¤·à¥à¤¯ के शरीर में पहà¥à¤à¤šà¤¤à¥‡ हैं। कई बार सीधे रोगी के समà¥à¤ªà¤°à¥à¤• में आने से सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ मनà¥à¤·à¥à¤¯ को हैजे का संकà¥à¤°à¤®à¤£ हो सकता है। हैजा को कॉलरा à¤à¥€ कहा जाता है। à¤à¤• सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ मनà¥à¤·à¥à¤¯ के शरीर में मà¥à¤à¤¹ के माधà¥à¤¯à¤® से पहà¥à¤à¤š कर विवरियो-कोलà¥à¤°à¥€ जीवाणॠछोटी आà¤à¤¤ का संकà¥à¤°à¤®à¤£ करते हैं। यह संकà¥à¤°à¤®à¤£ इन जीवाणà¥à¤“ं दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ सà¥à¤°à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ à¤à¤• जहरीले पदारà¥à¤¥ के कारण होता है जिसे ‘इणà¥à¤Ÿà¥€à¤°à¥‹à¤Ÿà¥‰à¤•à¥à¤¸à¤¿à¤¨â€™ कहा जाता है। यह केवल मानव शरीर में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ छोटी आà¤à¤¤ की दीवारों पर ही अपना दà¥à¤·à¥à¤ªà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ डालता है जिसके फलसà¥à¤µà¤°à¥‚प रोगी को दसà¥à¤¤ की शिकायत हो जाती है। आमतौर पर लगà¤à¤— नबà¥à¤¬à¥‡ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤ रोगियों में यह सामानà¥à¤¯ अतिसार की तरह उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होती है परनà¥à¤¤à¥ कà¥à¤› लोगों में यह जानलेवा à¤à¥€ सिदà¥à¤§ हो सकती है। यह रोग सà¤à¥€ आयॠवरà¥à¤—ों में पाया जाता है, परनà¥à¤¤à¥ छोटे बचà¥à¤šà¥‡ इसके कà¥à¤ªà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ से जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ होते हैं। हैजा का उलà¥à¤²à¥‡à¤– आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ में à¤à¥€ मिलता है तथा सà¥à¤¶à¥à¤°à¥à¤¤ संहिता में à¤à¥€ इसका वरà¥à¤£à¤¨ किया गया है। गनà¥à¤¦à¥‡ कà¥à¤“ं, नहरों, पोखरों, तालाबों तथा दूषित नदियों का पानी इस रोग को फैलाने में मà¥à¤–à¥à¤¯ à¤à¥‚मिका निà¤à¤¾à¤¤à¥‡ हैं। कई बार रोगी के मल व उसकी उलà¥à¤Ÿà¥€ के समà¥à¤ªà¤°à¥à¤• में आने से à¤à¥€ यह रोग हो जाता है। मेलों तथा परà¥à¤µà¥‹à¤‚ के दौरान जब बहà¥à¤¤ से लोग à¤à¤• सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर इकटà¥à¤ ा होते हैं, तब इस रोग के फैलने की समà¥à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ और à¤à¥€ बॠजाती है। यह रोग उन लोगों में जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ पाया जाता है, जिनमें साफ-सफाई का अà¤à¤¾à¤µ होता है तथा बहà¥à¤¤ से लोग à¤à¤• छोटी जगह पर निवास करते हैं। मकà¥à¤–ियाठकà¥à¤› सीमा तक इस बीमारी को फैलाने में अपनी à¤à¥‚मिका निà¤à¤¾à¤¤à¥€ हैं। जब वे रोगी के मल अथवा उलà¥à¤Ÿà¥€ पर बैठती हैं तो हैजे के जीवाणॠउनके शरीर से चिपक जाते हैं। यही मकà¥à¤–ियाठजब अनà¥à¤¯ खादà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ पर जाकर बैठती है तो उस खादà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥ में हैजा के जीवाणॠपहà¥à¤à¤š जाते हैं तथा उसमें पनपने लगते हैं। इस खादà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥ को अगर कोई सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ मनà¥à¤·à¥à¤¯ खा ले तो उससे हैजा हो जाने की समà¥à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ होती है। हैजा के लकà¥à¤·à¤£à¥‹à¤‚ में दसà¥à¤¤ सरà¥à¤µà¤ªà¥à¤°à¤®à¥à¤– है। रोगी को दसà¥à¤¤ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ मातà¥à¤°à¤¾ में, बिना पेट में दरà¥à¤¦ हà¥à¤ और पतले चावल के पानी की तरह आता है। दसà¥à¤¤à¥‹à¤‚ की संखà¥à¤¯à¤¾ 40-50 पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨ तक हो सकती है। दसà¥à¤¤à¥‹à¤‚ के साथ ही उलà¥à¤Ÿà¥€ शà¥à¤°à¥‚ हो जाती है। कई बार उलà¥à¤Ÿà¥€ की शिकायत रोगी दसà¥à¤¤ लगने से पहले ही करते हैं। इस पà¥à¤°à¤•ार दसà¥à¤¤ और उलà¥à¤Ÿà¥€ के कारण रोगी के शरीर में पानी और लवणों की कमी हो जाती है। शरीर में हो रही पानी की कमी का पता आम आदमी इस पà¥à¤°à¤•ार लगा सकता है कि रोगी की आà¤à¤–ें अनà¥à¤¦à¤° धà¤à¤¸ जाती हैं, गाल पिचक जाते हैं, तà¥à¤µà¤šà¤¾ की चमक समापà¥à¤¤ हो जाती है, पेट अनà¥à¤¦à¤° धंस जाता है, शरीर का तापमान सामानà¥à¤¯ से कम हो जाता है, नबà¥à¤œ पतली हो जाती है और कई बार रिकॉरà¥à¤¡ ही नहीं की जा सकती। पैरों तथा पेट की मांसपेशियों में खिंचाव तथा दरà¥à¤¦ का अनà¥à¤à¤µ होता है, पेशाब कम आता है और जैसे-जैसे बीमारी बà¥à¤¤à¥€ है, पेशाब आना बिलà¥à¤•à¥à¤² बनà¥à¤¦ हो जाता है, इससे गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡ काम करना बनà¥à¤¦ कर देते हैं। रोग की इस अवसà¥à¤¥à¤¾ को ‘अकà¥à¤¯à¥‚ट रीनल फेलà¥à¤¯à¥‹à¤°â€™ कहा जाता है। रोगी को बहà¥à¤¤ बेचैनी होती है और उसे बार-बार पà¥à¤¯à¤¾à¤¸ की अनà¥à¤à¥‚ति होती है। अगर इस अवसà¥à¤¥à¤¾ में à¤à¥€ उपचार न हो पाठतो रोगी मूरà¥à¤›à¤¿à¤¤ हो जाता है। यह अवसà¥à¤¥à¤¾ इस बात पर निरà¥à¤à¤° करती है कि रोगी के शरीर से तरल पदारà¥à¤¥ की समापà¥à¤¤à¤¿ कितनी जलà¥à¤¦à¥€ और कितने समय में हà¥à¤ˆ है। पानी की कमी के कारण डिहाइडà¥à¤°à¥‡à¤¶à¤¨, शरीर में तेजाबी मातà¥à¤°à¤¾ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ हो जाने के कारण, à¤à¤¸à¤¿à¤¡à¥‰à¤¸à¤¿à¤¸ तथा लवण पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ का सनà¥à¤¤à¥à¤²à¤¨ बिगड़ जाने के कारण, डिसà¥à¤‡à¤²à¥ˆà¤•à¥à¤Ÿà¥à¤°à¥‹à¤²à¤¾à¤‡à¤Ÿà¥€à¤®à¤¿à¤¯à¤¾ से रोगी की मृतà¥à¤¯à¥ हो जाती है। बचाव कà¥à¤› मामूली-सी सावधानियाठबरत कर हम सà¤à¥€ हैजा जैसे à¤à¤¯à¤‚कर रोग से बचाव कर सकते हैं। कà¤à¥€ à¤à¥€ गनà¥à¤¦à¥‡ कà¥à¤“ं, तालाब, पोखरों, नहरों तथा दूषित नदियों के पानी को न पिà¤à¤à¥¤ जो हैणà¥à¤¡-पमà¥à¤ª इन तालाबों, पोखरों तथा नदियों के किनारे सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ हैं तथा कम गहराई के हैं, उनका पानी à¤à¥€ खतरनाक सिदà¥à¤§ हो सकता है। खाना खाने से पहले हाथ साबà¥à¤¨ से अचà¥à¤›à¥€ तरह से धोà¤à¤à¥¤ बाजार में बिक रहे कटे फल कà¤à¥€ न खाà¤à¤à¥¤ हो सके तो पानी को उबाल कर फिर उसे ठणà¥à¤¡à¤¾ करके पिà¤à¤à¥¤ साफ व ताजे बने à¤à¥‹à¤œà¤¨ का सेवन करें। छोटे बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को कà¤à¥€ à¤à¥€ बोतल से दूध न पिलाà¤à¤à¥¤ हैजा के रोगी के समà¥à¤ªà¤°à¥à¤• में आने के बाद अपने हाथों को तà¥à¤°à¤¨à¥à¤¤ साबà¥à¤¨-पानी से धोà¤à¤à¥¤ à¤à¤¸à¥‡ रोगी का मल तथा उलà¥à¤Ÿà¥€ कà¤à¥€ à¤à¥€ खà¥à¤²à¥‡ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर अथवा नदियों, नहरों आदि में न फेंके। इन सब बातों का धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखने के बाद à¤à¥€ अगर किसी अनजानी गलती की वजह से दसà¥à¤¤ लग जाते हैं तो तà¥à¤°à¤¨à¥à¤¤ जीवनरकà¥à¤·à¤• घोल का सेवन शà¥à¤°à¥‚ कर देना चाहिà¤à¥¤ इस घोल का मà¥à¤–à¥à¤¯ उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ शरीर में हो रहे पानी व लवणों की कमी को पूरा करना है और इससे हैजा के रोगियों में हो रही मृतà¥à¤¯à¥à¤¦à¤° को कम किया जा सकता है। अतà¥à¤¯à¤¨à¥à¤¤ संवेदनशील कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में हैजे से बचाव के टीके à¤à¥€ लगाठजाते हैं। यह टीकाकरण दो टीकों के रूप में होता है, जो 4 से 6 सपà¥à¤¤à¤¾à¤¹ के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² पर लगाठजाते हैं और 6 महीने के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ बूसà¥à¤Ÿà¤° टीका लगाया जाता है। यह बात धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ देने योगà¥à¤¯ है कि यह टीका à¤à¤• साल से कम उमà¥à¤° के बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को नहीं दिया जा सकता। यह टीका बहà¥à¤¤ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ उपयोगी सिदà¥à¤§ नहीं हो पा रहा कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इससे पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¤•ता की अवधि कम होती है। हैजा रोग को पूरी तरह से नियनà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¤ किया जा सकता है। इसके लिठजरूरी है कि हम इससे बचाव पर पूरà¥à¤£à¤°à¥‚प से धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ दें। अतिसार रोग अतिसार उन बीमारियों का à¤à¤• समूह है जिसका मà¥à¤–à¥à¤¯ लकà¥à¤·à¤£ दसà¥à¤¤ होता है। यह बीमारी हमारे शरीर में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ अà¤à¤¤à¥œà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के संकà¥à¤°à¤®à¤£ के कारण होती है। ये संकà¥à¤°à¤®à¤£ विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ जीवाणà¥, विषाणॠà¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¥‹à¤Ÿà¥‹à¤œà¥‹à¤µà¤¾ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ हो सकता है। अतिसार रोग हमारे देश की सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§à¥€ à¤à¤• बड़ी समसà¥à¤¯à¤¾ है। इसका अनà¥à¤®à¤¾à¤¨ इस तथà¥à¤¯ से लगाया जा सकता है कि à¤à¤¾à¤°à¤¤ में पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤µà¤°à¥à¤· कई लाख बचà¥à¤šà¥‡ इस रोग से मरते हैं। अतिसार à¤à¤• संकà¥à¤°à¤¾à¤®à¤• रोग है। यह रोग बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ में सबसे जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ पाया जाता है। इस रोग का संकà¥à¤°à¤®à¤£ किसी à¤à¥€ आयॠवरà¥à¤— के वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ में हो सकता है परनà¥à¤¤à¥ बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ में, खासतौर पर 6 माह से 2 वरà¥à¤· की आयॠवरà¥à¤— वाले बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ में यह सबसे अधिक कà¥à¤ªà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ डालता है। जिन बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को बोतल से दूध पिलाया जाता है उनमें अतिसार रोग होने की समà¥à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ और à¤à¥€ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ बॠजाती है। इसका मà¥à¤–à¥à¤¯ कारण यह है कि बोतल साधारणतः ठीक ढंग से साफ नहीं हो पाती, जिसके कारण अतिसार उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ करने वाले जीवाणॠउसमें पनपते रहते हैं और दूध के माधà¥à¤¯à¤® से बचà¥à¤šà¥‡ के शरीर में पहà¥à¤à¤š जाते हैं। कमजोर लोग अतिशीघà¥à¤° इस रोग के शिकार हो जाते हैं। गरीबी, सà¥à¤µà¤šà¥à¤›à¤¤à¤¾ की कमी, à¤à¤• सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ लोगों का निवास करना, रोग के फैलाने में अहम à¤à¥‚मिका निà¤à¤¾à¤¤à¥‡ हैं। रोगी के मल दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ अतिसार रोग उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ करने वाले जीवाणà¥, विषाणॠतथा पà¥à¤°à¥‹à¤Ÿà¥‹à¤œà¥‹à¤µà¤¾ शरीर से बाहर आते हैं। इस मल दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ जल à¤à¤µà¤‚ अनà¥à¤¯ खादà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ के दूषित हो जाने से सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ मनà¥à¤·à¥à¤¯ में यह रोग फैलता है। कई बार जानवरों के माधà¥à¤¯à¤® से à¤à¥€ यह रोग सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ मनà¥à¤·à¥à¤¯ तक पहà¥à¤à¤šà¤¤à¤¾ है और कई बार सीधे रोगी के समà¥à¤ªà¤°à¥à¤• में आने से यह उसके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ उपयोग में लाई गई संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ वसà¥à¤¤à¥à¤“ं का उपयोग करने से à¤à¥€ यह रोग फैल सकता है। à¤à¤¸à¥€ वसà¥à¤¤à¥à¤“ं में रोगी का बिसà¥à¤¤à¤°, तौलिया, बरà¥à¤¤à¤¨ आदि पà¥à¤°à¤®à¥à¤– होते हैं। गनà¥à¤¦à¥‡ कà¥à¤“ं, नहरों, तालाबों तथा दूषित नदियों के पानी के सेवन से à¤à¥€ इस रोग की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ हो सकती है। मेलों, शादियों तथा परà¥à¤µà¥‹à¤‚ के दौरान जब बहà¥à¤¤ से लोग à¤à¤• सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर इकटà¥à¤ ा होते हैं, तब इस रोग के फैलने की समà¥à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ और à¤à¥€ बॠजाती है। मकà¥à¤–ियाठà¤à¥€ इस बीमारी को फैलाने में अपनी à¤à¥‚मिका निà¤à¤¾à¤¤à¥€ हैं। पतले दसà¥à¤¤ आना अतिसार रोग का मà¥à¤–à¥à¤¯ लकà¥à¤·à¤£ है। ये दसà¥à¤¤ शरीर की अà¤à¤¤à¥œà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के संकà¥à¤°à¤®à¤£ के फलसà¥à¤µà¤°à¥‚प होता है। ये दसà¥à¤¤ पानी की तरह पतले होते हैं और बार-बार आते हैं। इस अवसà¥à¤¥à¤¾ को ‘डायरिया’ कहा जाता है। कई बार इन दसà¥à¤¤à¥‹à¤‚ में खून à¤à¥€ पाया जाता है, इस अवसà¥à¤¥à¤¾ को ‘खूनी पेचिस’ या ‘डाइसैंटरी’ कहा जाता है। दसà¥à¤¤à¥‹à¤‚ के साथ-साथ रोगी को बà¥à¤–ार आना, उलà¥à¤Ÿà¥€ होना, सिर दरà¥à¤¦, à¤à¥‚ख न लगता और कमजोरी की शिकायत à¤à¥€ हो सकती है। बहà¥à¤¤ से रोगी पेटदरà¥à¤¦ और मांसपेशियों में खिंचाव तथा दरà¥à¤¦ की शिकायत à¤à¥€ करते हैं। साधारणतः à¤à¤¸à¥€ अवसà¥à¤¥à¤¾ 3 से 7 दिन के लिठहोती है। अगर ठीक ढंग से उपचार न किया जाठतो दसà¥à¤¤à¥‹à¤‚ तथा उलà¥à¤Ÿà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के कारण रोगी के शरीर में पानी और लवणों की कमी हो जाती है। इस अवसà¥à¤¥à¤¾ में रोगी का रकà¥à¤¤à¤šà¤¾à¤ª (बà¥à¤²à¤¡-पà¥à¤°à¥‡à¤¶à¤°) à¤à¥€ रिकॉरà¥à¤¡ नहीं हो पाता। पेशाब कम आता है और जैसे-जैसे बीमारी बà¥à¤¤à¥€ है, पेशाब आना बिलà¥à¤•à¥à¤² बनà¥à¤¦ हो जाता है। गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡ काम करना बनà¥à¤¦ कर देते हैं। इस अवसà¥à¤¥à¤¾ को ‘अकà¥à¤¯à¥‚ट रीनल फेलà¥à¤¯à¥‹à¤°â€™ कहा जाता है। इससे रोगी को बहà¥à¤¤ बेचैनी होती है और उसे बार-बार पà¥à¤¯à¤¾à¤¸ की अनà¥à¤à¥‚ति होती है। अगर इस अवसà¥à¤¥à¤¾ में à¤à¥€ उपचार न हो पाठतो रोगी मूरà¥à¤›à¤¿à¤¤ हो जाता है और बाद में रोगी की मृतà¥à¤¯à¥ हो सकती है। बचाव अतिसार के संकà¥à¤°à¤®à¤£ से कà¥à¤› मामूली-सी सावधानियाठबरत कर हम इस रोग से बचाव कर सकते हैं। बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को कà¤à¥€ à¤à¥€ बोतल से दूध न पिलाà¤à¤à¥¤ जहाठतक समà¥à¤à¤µ हो कटोरी-चमà¥à¤®à¤š से ही बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को दूध पिलाà¤à¤à¥¤ माठका दूध बचà¥à¤šà¥‡ को हमेशा देना चाहिà¤à¥¤ यह देखा गया है कि जो बचà¥à¤šà¥‡ माठका दूध पीते हैं, उनमें अतिसार होने की समà¥à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ अनà¥à¤¯ बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के मà¥à¤•ाबले बहà¥à¤¤ कम होती है। इसका कारण यह है कि माठके दूध में रोग रकà¥à¤·à¤• ततà¥à¤µ होता है। दसà¥à¤¤ के दौरान à¤à¥€ माठका दूध बचà¥à¤šà¥‡ को देते रहना चाहिà¤à¥¤ जो बचà¥à¤šà¥‡ à¤à¥‹à¤œà¤¨ खा सकते हैं, उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ दसà¥à¤¤ के दौरान à¤à¥‹à¤œà¤¨ का सेवन करते रहना चाहिà¤à¥¤ इससे बचाव के लिठहम सà¤à¥€ को उन सà¤à¥€ बातों का धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखना है जो हैजा से बचाव के लिठजरूरी हैं। इन सà¤à¥€ बातों का धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखने के बाद à¤à¥€, अगर किसी अनजानी गलती की वजह से किसी को दसà¥à¤¤ होते हैं तो तà¥à¤°à¤¨à¥à¤¤ जीवनरकà¥à¤·à¤• घोल का सेवन शà¥à¤°à¥‚ कर देना चाहिà¤à¥¤ यह घोल अतिसार रोग के उपचार में बहà¥à¤¤ महतà¥à¤¤à¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¥‚मिका निà¤à¤¾à¤¤à¥‡ हैं। à¤à¤• रिपोरà¥à¤Ÿ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤°, जीवनरकà¥à¤·à¤• घोल, अतिसार रोग में पानी की कमी (डिहाइडà¥à¤°à¥‡à¤¶à¤¨) के कारण हो रही लगà¤à¤— 10 लाख मृतà¥à¤¯à¥ को पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤µà¤°à¥à¤· बचा पाने में सफल रहा है। यह तथà¥à¤¯ जीवनरकà¥à¤·à¤• घोल की à¤à¤• महान उपलबà¥à¤§à¤¿ है। इस घोल का मà¥à¤–à¥à¤¯ उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ शरीर में हो रही पानी व लवणों की कमी को पूरा करना है। अतिसार रोग को पूरी तरह से नियनà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¤ किया जा सकता है अगर हम इससे बचाव पर पूरà¥à¤£à¤°à¥‚प से धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ दें। पीलिया (हैपेटाइटिस-à¤) जिगर (लिवर) के संकà¥à¤°à¤®à¤£ से उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ रोग को साधारण à¤à¤¾à¤·à¤¾ में पीलिया कहा जाता है। आमतौर पर गरà¥à¤®à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ तथा बरसात की ऋतॠमें और दूषित जल à¤à¤µà¤‚ à¤à¥‹à¤œà¤¨ के सेवन से उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ पीलिया को चिकितà¥à¤¸à¤•ीय à¤à¤¾à¤·à¤¾ में हैपेटाइटिस-ठकहा जाता है। इस रोग का मूल कारण हैपेटाइटिस-ठनामक विषाणॠहोता है। हैपेटाइटिस-ठके अतिरिकà¥à¤¤ अनà¥à¤¯ अनेक पà¥à¤°à¤•ार के विषाणॠहैं जो पीलिया रोग उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ करते हैं। इनमें पà¥à¤°à¤®à¥à¤– हैपेटाइटिस-बी, हैपेटाइटिस-सी, हैपेटाइटिस-डी, हैपेटाइटिस-ई, नॉन ठहैपेटाइटिस, नॉन ठनॉन बी हैपेटाइटिस आदि हैं। इनमें से हैपेटाइटिस-बी वायरस खून और खून के विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ à¤à¤¾à¤—ों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ à¤à¤• वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ से दूसरे में जाता है। इंजेकà¥à¤¶à¤¨ की दूषित सूइयों के माधà¥à¤¯à¤® से à¤à¥€ यह वायरस à¤à¤• रोगी से दूसरे वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ में जा सकता है। जबकि हैपेटाइटिस नॉन ठनॉन बी का à¤à¤• हिसà¥à¤¸à¤¾ हैपेटाइटिस-बी की à¤à¤¾à¤à¤¤à¤¿ रकà¥à¤¤ व इसके विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ हिसà¥à¤¸à¥‹à¤‚ से à¤à¤• वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ से दूसरे में जाता है, तो दूसरी ओर इसका दूसरा à¤à¤¾à¤— हैपेटाइटिस-ठकी तरह रोगी के मल दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ खादà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ के दूषित हो जाने से à¤à¤• रोगी से अनà¥à¤¯ सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ में संकà¥à¤°à¤®à¤£ करता है। यहाठहम केवल हैपेटाइटिस-ठव अनà¥à¤¯ उन वायरसों पर ही चरà¥à¤šà¤¾ करेंगे जो खादà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ के इन वायरसों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ दूषित हो जाने के कारण होता है। हैपेटाइटिस-ठà¤à¤• संकà¥à¤°à¤¾à¤®à¤• रोग है जो विषाणà¥à¤“ं दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ जिगर की कोशिकाओं के संकà¥à¤°à¤®à¤£ से उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होता है। यह रोग समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¤¾à¤°à¤¤ में पाया जाता है। उनà¥à¤¨à¤¤ देशों में यह रोग न के बराबर रह गया है। इसका मà¥à¤–à¥à¤¯ कारण यह है कि यह रोग संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के मल दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ पानी और à¤à¥‹à¤œà¤¨ के दूषित होने के कारण होता है। संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के मल दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ विषाणॠशरीर से बाहर आते हैं और जल तथा अनà¥à¤¯ खादà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ के इस मल दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ दूषित हो जाने के माधà¥à¤¯à¤® से à¤à¤• सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के शरीर में यह रोग पहà¥à¤à¤šà¤¤à¤¾ है। इससे जिगर की कोशिकाओं को नà¥à¤•सान पहà¥à¤à¤šà¤¤à¤¾ है और इसके फलसà¥à¤µà¤°à¥‚प संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ को पीलिया रोग हो जाता है। à¤à¤¾à¤°à¤¤ में शà¥à¤¦à¥à¤§ पेयजल वितरण वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ की कमी और साफ-सफाई व मल वà¥à¤¯à¤¯à¤¨ का समà¥à¤šà¤¿à¤¤ पà¥à¤°à¤¬à¤¨à¥à¤§à¤¨ न होने के कारण यह रोग बहà¥à¤¤ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ मातà¥à¤°à¤¾ में पाया जाता है, इसके विपरीत पशà¥à¤šà¤¿à¤®à¥€ देशों में वहाठकी अचà¥à¤›à¥€ जल वितरण वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ और सही मल-निषà¥à¤•ासन माधà¥à¤¯à¤® होने के कारण यह रोग लगà¤à¤— खतà¥à¤® हो गया है। हैपेटाइटिस-ठके विषाणॠकाफी समय तक गरà¥à¤®à¥€ और रासायनिक पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ के पà¥à¤°à¤•ोप को à¤à¥‡à¤² सकते हैं। यह à¤à¥€ देखा गया है कि ये विषाणॠपानी में à¤à¥€ काफी समय तक जीवित रह सकते हैं। जल को वितरण हेतॠसाफ करने के लिठआमतौर पर कà¥à¤²à¥‹à¤°à¥€à¤¨ की जो मातà¥à¤°à¤¾ उपयोग में लाई जाती है, उससे à¤à¥€ ये विषाणॠनहीं मरते हैं। हाà¤, अगर पानी को 10-15 मिनट तक उबाला जाठतो ये विषाणॠमर जाते हैं। हैपेटाइटिस-ठमें रोगी को बà¥à¤–ार आता है जो आमतौर पर बहà¥à¤¤ तेज नहीं होता। उसे ठणà¥à¤¡ लगती है। सिरदरà¥à¤¦, थकान और निरनà¥à¤¤à¤° बà¥à¤¤à¥€ हà¥à¤ˆ कमजोरी का अनà¥à¤à¤µ होता है। रोगी की à¤à¥‚ख धीरे-धीरे खतà¥à¤® हो जाती है। जी मचलाता है। उलà¥à¤Ÿà¥€ आती है। पेशाब का रंग गाà¥à¤¾ पीला हो जाता है तथा आà¤à¤–ें व तà¥à¤µà¤šà¤¾ पर पीलापन आ जाता है। रोगी को खारिश à¤à¥€ हो सकती है। इस रोग में लिवर की कारà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤£à¤¾à¤²à¥€ फेल हो जाने के कारण होने वाली मृतà¥à¤¯à¥ केवल 0.1 पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤ रोगियों में देखी गई है और वह à¤à¥€ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ आयॠवरà¥à¤— के रोगियों में अधिक पाई गई है। इस रोग के रोगी को पूरà¥à¤£à¤°à¥‚प से आराम करना चाहिà¤à¥¤ साफ-सà¥à¤¥à¤°à¥‡ तरीके़ से बनी हà¥à¤ˆ मीटà¥à¤ ी वसà¥à¤¤à¥à¤“ं का सेवन लाà¤à¤¦à¤¾à¤¯à¤• होता है। घी, चिकने पदारà¥à¤¥ तथा तले हà¥à¤ खादà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ से परहेज करना चाहिà¤à¥¤ बचाव हैपेटाइटिस-ठà¤à¤• पूरà¥à¤£à¤°à¥‚प से बचाई जा सकने वाली बीमारी है। अगर दिन-पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨ की कारà¥à¤¯à¤¶à¥ˆà¤²à¥€ में थोड़ी-सी सावधानियाठबरती जाà¤à¤ तो इस रोग से पूरी तरह से बचाव समà¥à¤à¤µ है। हाईरिसà¥à¤• समूह के लोगों को (वे लोग जो उस सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर जा रहे हैं जहाठहैपेटाइटिस-ठ(पीलिया) फैला हो या रोगी के साथ रह रहे वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को) बचाव के लिठ‘हियà¥à¤®à¤¨ इमà¥à¤¯à¥à¤¨à¥‹à¤—à¥à¤²à¥‹à¤¬à¥à¤²à¤¿à¤¨à¤â€™ के इंजेकà¥à¤¶à¤¨ लगवाने चाहिà¤à¥¤ ये इंजेकà¥à¤¶à¤¨ à¤à¤¸à¥‡ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के शरीर में हैपेटाइटिस-ठके विषाणà¥à¤“ं के खि़लाफ लड़ने की कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ करते हैं जिसे ‘पैसिव इमà¥à¤¯à¥à¤¨à¤¿à¤Ÿà¥€â€™ कहा जाता है। इन इंजेकà¥à¤¶à¤¨ का उपयोग केवल चिकितà¥à¤¸à¤• की सलाह के उपरानà¥à¤¤ ही करना चाहिà¤à¥¤ हैपेटाइटिस-ठसे बचाव के लिठरोग रकà¥à¤·à¤• टीके अब विकसित हो गठहैं, जिनका उपयोग चिकितà¥à¤¸à¤• की सलाह उपरानà¥à¤¤ किया जा सकता है। - See more at: http://dkhabartoday.com/news/health/42/#sthash.lSn9Wkaf.dpuf
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