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8 April, 2016, 04:05 AM
अगर स्किन पर हो रही है एलर्जी, तो आपको चाहिए आयुर्वेद का ये मैजिक!
नई दिल्ली। आजकल की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हमने फास्ट फूडस्, कोल्ड ड्रिंक्स, चीज, चॉकलेटस जैसे पदार्थों को अपने जीवन प्रणाली में शामिल कर लिया है, जिससे शरीर में पित्तप्रकूपित होकर शरीर पर खुज़ली, दाह युक्त चकत्ते पैदा करते हैं। यही शीतपित्त है। तरल पदार्थों का कम सेवन करना और पित्तवर्धक पदार्थ ज्यादा खाना यही शीतपित्त का जनक है।
इसे अगर हम आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से देखें, तो आचार्यों के मतानुसार मतलब ठंडी हवा के स्पर्श से। आधुनिक मतानुसार भी यह अर्टिकेरिया है, जो कहीं भी हो सकता है। शीतपित्त संस्पर्शात्प्रदुष्टौ कफमारूतौ। पित्तेन सह संभुय बहिरन्तर्विसर्पतः।। रोग के कारण व प्रसार ठंडी हवा के स्पर्श से कफ और वात प्रकूपित होकर पित्त के साथ मिलकर बाह्य त्वचा तथा आंतरिक रक्तादि धातुओं में फैलकर ‘शीतपित्त’ को उत्पन्न करते हैं।
इसमें बनने वाले चकत्ते कभी नुकीले और छोटे होते हैं, तो कभी सिक्कों के जितने आकार के होते हैं। इस बीमारी में शरीर पर किंचित लालिमा युक्त चकत्ते बनते हैं, साथ ही ज्यादा खुज़ली और दर्द भी होता है। खुजलाने पर ये और ज्यादा बढ़ जाते हैं।
घरेलू उपचारः दूध के साथ हल्दी का सेवन करें, जो त्वचा को निखारने के साथ-साथ दूषित रक्त को भी साफ करता है। गेरू और फिटकरी कूटकर चकत्तों पर लगाएं। शीतपित्त के चकत्तों पर 1 चम्मच पुदीना का रस लगाने से खुजली में आराम मिलता है। इस बीमारी को हम उचित आहार-विहार से भी दूर कर सकते हैं।
अगर पीडिकाओं या दानों में दर्द और चुभन हो तो 1/4 कप गुलाबजल और व्हिनेगर 1/4 कप मिलाकर लगायें। इस स्थिति में ठंडे पानी से नहाने से लाभ मिलता है। कैलामाइन लोशन लगाना भी लाभप्रद है। घृतकुमारी दाहयुक्त जगह पर लगायें। श्करे जो सेवन नीम, हरिद्रा, मंजिष्ठ, गिलोय शीतपित्त वो जड़ से खोय।
नोटः इन नुस्खों को आजमाने से पहले किसी विशेषज्ञ की सलाह अवश्य ले लें। कृपया याद रखें, घरेलू उपचार को दवाओं के स्थान पर प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। अगर इससे आपकी हालत में सुधार नहीं आता है, तो किसी चिकित्सक की मदद अवश्य लें।
Source:
http://khabar.ibnlive.com/news/ghar-parivar/%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%8F%E0%A4%B2%E0%A4%B0%E0%A5%8D-467781.html




